मौर्यकाल

  1. सबसे प्राचीनतम राजवंश कौन-सा है— मौर्य वंश
  2. मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की— चंद्रगुप्त मौर्य
  3. मौर्य वंश की स्थापना कब की गई— 322 . पू.
  4. कौटिल्य/चाणक्य किसका प्रधानमंत्री था— चंद्रगुप्त मौर्य का
  5. चाणक्य का दूसरा नाम क्या था— विष्णु गुप्त
  6. चंदगुप्त के शासन विस्तार में सबसे अधिक मदद किसने की— चाणक्य ने
  7. किसकी तुलना मैकियावेली के ‘प्रिंस’ से की जाती है— कौटिल्य का अर्थशास्त्र
  8. किस शासक ने सिंहासन पर बैठने के लिए अपने बड़े भाई की हत्या की थी— अशोक
  9. सम्राट अशोक की उस पत्नी का नाम क्या था जिसने उसे प्रभावित किया था— कारुवाकी
  10. अशोक ने सभी शिलालेखों में एक रुपया से किस प्राकृत का प्रयोग किया था— मागधी
  11. बिंदुसार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अशोक को कहाँ भेजा था— तक्षशिला
  12. किस सम्राट का नाम ‘देवान प्रियादर्शी’ था— सम्राट अशोक
  13. किस राजा ने कलिंग के युद्ध में नरसंहार को देखकर बौद्ध धर्म अपना लिया था— अशोक ने
  14. कलिंग का युद्ध कब हुआ— 261 . पू.
  15. प्राचीन भारत का कौन-सा शासक था जिसने अपने अंतिम दिनों में जैनधर्म को अपना लिया था— चंद्रगुप्त मौर्य
  16. मौर्य साम्राज्य में कौन-सी मुद्रा प्रचलित थी— पण
  17. अशोक का उत्तराधिकारी कौन था— कुणाल
  18. अर्थशास्त्र का लेखक किसके समकालीन था— चंद्रगुप्त मौर्य
  19. मौर्य काल में शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र कौन-सा था— तक्षशिला
  20. यूनान के शासक सेल्यूकस ने अपने राजदूत मेगास्थनीज को किसके राज दरबार में भारत भेजा— चंद्रगुप्त मौर्य
  21. चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को कब पराजित किया— 305 . पू.
  22. मेगस्थनीज की पुस्तक का क्या नाम है— इंडिका
  23. किसके ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के विशिष्ट रूप का वर्णन हुआ है— विशाखदत्त के ग्रंथ में
  24. ‘मुद्राराक्षस’ के लेखक कौन है— विशाखदत्त
  25. किस स्त्रोत में पाटलिपुत्र के प्रशासन का वर्णन है— इंडिका
  26. अशोक के शिलालेखों में कौन-सी भाषा थी— पाकृत
    किस मौर्य राजा ने दक्कन पर विजय प्राप्त की थी— कुणाल ने
  27. मेगास्थनीज द्वारा अपनी पुस्तक में समाज को कितने भागों में बाँटा गया था— पाँच
  28. ‘अर्थशास्त्र’ किसके संबंधित है— राजनीतिक नीतियों से
  29. किस शासक ने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया— चंद्रगुप्त मौर्य ने
  30. पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त का महल किसका बना था— लकड़ी का
  31. किस अभिलेख से यह सिद्ध होता है कि चंद्रगुप्त का प्रभाव पश्चिम भारत तक फैला हुआ था— रुद्रदमन का जूनागढ़ अभिलेख
  32. सर्वप्रथम भारतीय साम्राज्य किसने स्थापित किया— चंद्रगुप्त मौर्य ने
  33. किस स्तंभ में अशोक ने स्वयं को मगध का सम्राट बताया है— भाब्रू स्तंभ
  34. उत्तराखंड में अशोक का शिलालेख कहाँ स्थित है— कालसी में
  35. अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला प्रथम अंग्रेज कौन था— जेम्स प्रिंसेप
  36. कलिंग युद्ध की विजय तथा क्षत्रियों का वर्णन किया शिलालेख में है— 13वें शिलालेख में (XIII)
  37. कौन-सा शासक जनता के संपर्क में रहता था— अशोक
  38. किस ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग किया गया है— मुद्राराक्षस
  39. किस राज्यादेश में अशोक के व्यक्तिगत नाम का उल्लेख मिलता है— मास्की
  40. श्रीनगर की स्थापना किस मौर्य शासक ने की— अशोक
  41. किस ग्रंथ में शुद्रों के लिए ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है— अर्थशास्त्र में
  42. किसने पाटलिपुत्र को ‘पोलिब्रोथा’ कहा था— मेगास्थनीज ने
  43. मौर्य काल में ‘एग्रनोमाई’ किसको कहा जाता था— सड़क निर्माण अधिकारी को
  44. अशोक के बारे में जानने के लिए महत्पूर्ण स्त्रोत क्या है— शिलालेख
  45. ‘भारतीय लिखने की कला नहीं जानते हैं’ यह किसने कहा था— मेगास्थनीज ने
  46. बिंदुसार की मृत्यु के समय अशोक एक प्रांत का गवर्नर था, वह प्रांत कौन-सा था— उज्जैन
  47. किसने अपने पुत्र व पुत्री को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार हेतु श्रीलंका भेजा— अशोक ने
  48. कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र कितने अभिकरणों में विभाजित है— 15
  49. अशोक का अभिलेख भारत के अलावा किस अन्य स्थान पर भी पाया गया है— अफगानिस्तान
  50. किस शिलालेख में अशोक ने घोषणा की, ‘‘सभी मनुष्य मेरे बच्चे है’’— प्रथम पृथक शिलालेख में
  51. किस स्थान से अशोक के शिलालेख के लिए पत्थर लिया जाता था— चुनार से
  52. किस महीने में मौर्यों का राजकोषीय वर्ष आरंभ होता था— आषाढ़ (जुलाई)
  53. किस जैन ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के जैन धर्म अपनाने का उल्लेख मिलता है— परिशिष्ट पर्व में
  54. चंद्रगुप्त मौर्य का संघर्ष किस यूनानी शासक से हुआ— सेल्यूकस से
  55. एरियन ने चंद्रगुप्त मौर्य को क्या नाम दिया— सैंड्रोकोट्स
  56. किस ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए ‘कुलहीन’ शब्द का प्रयोग हुआ— मुद्राराक्षस
  57. किस ग्रंथ में दक्षिणी भारत के आक्रमणों का पता चलता है— तमिल ग्रंथ अहनानूर
  58. चंद्रगुप्त मौर्य का निधन कब हुआ— 297 . पू.

वैदिक कालीन धार्मिक अवस्था

आर्यों के धार्मिक विचार, विश्वास और आस्था की झलक हमें ऋग्वेद से प्राप्त होती है। धार्मिक मतभेद के कारण ही भारतीय आर्य ईरान छोड़कर भारत में बस गए थे। उनके धर्म को ‘देवधर्म’ कहा गया। भारतवर्ष में धीरे-धीरे उनके धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों का विकास हुआ। सरल ह्रदय आर्य प्रकृति के संपर्क में आया। उसकी रहस्यमयी शक्ति को देखकर वह आश्चर्यचकित और भयभीत हुआ। उसने उसकी आराधना और उपासना की। कालांतर में उसने प्रकृति के रहस्यमय स्वरूप का मानवीकरण कर डाला और उन्हें देवी-देवताओं का रूप दे डाला। वास्तव में ‘देवता’ का अर्थ ‘प्रकाश का ज्ञान देने वाला’ होता है। ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख मिलता है जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

१ आकाशवाणी देवता- द्यौ, वरुण, मित्र, सूर्य, सविता, उषा इत्यादि।

२ अंतरिक्षवासी देवता- इंद्र, रूद्र, वायु, मरुत इत्यादि।

३ पृथ्वीवासी देता- पृथ्वी, अग्नि,सोम, बृहस्पति, सरस्वती इत्यादि।

देवताओं को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए वैदिक आर्य उनकी स्तुति तथा यज्ञ करते थे। पशुबलि भी अर्पित करते थे। परंतु उन्होंने किसी देवता को प्रमुखता प्रदान नहीं की, सभी उनके लिए पूज्य थे, शक्तिशाली थे। इस प्रकार ‘बहुदेवतावाद’ का विकास हआ। परंतु आर्यों की जिज्ञासा यहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अनुभव किया कि इन समस्त देवताओं के ऊपर एक सर्वोच्च सत्ता, एक परम तत्व है। इसको वैदिक ऋषियों ने विभिन्न नामों – ‘हिरण्यगर्भा’, ‘प्रजापति’ तथा ‘विश्वकर्मा’ – से अभिव्यक्त किया और यह प्रतिपादित किया कि ‘सत्’ एक ही है। इस प्रकार उन्होंने ‘एकेश्वरवाद’ की परिकल्पना प्रस्तुत की।

ऋग्वेद में पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक का वर्णन मिलता है। वे आत्मा तथा पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। ऋग्वेद में अमरता का उल्लेख मिलता है। परंतु वैराग्य और मोक्ष में उनकी आस्था नहीं थी। उन्होंने नैतिकता पर विशेष जोर दिया।

वैदिक कालीन आर्थिक अवस्था

ऋगवैदिक सभ्यता ग्राम सभ्यता थी। अतएव ऋग्वैदिक आर्थिक जीवन का मुख्य आधार गांव थे।

I) पशुपालन- पशुपालन वैदिक आर्यों का प्रमुख धंधा था। आर्य समाज में गाय की बड़ी महत्ता थी। अनेक ऋचाओं में गोधन के वृद्धि की प्रार्थना की गई है। वास्तव में पशु ही उनके धन थे। गाय के अतिरिक्त वे भेड़, बकरी, घोड़े, गधे, कुत्ते आदि पशुओं को भी पालते थे। चारागाह एवं चरवाहा का भी उल्लेख मिलता है। पशुओं के कानों में चिन्ह बनाने की भी प्रथा प्रचलित थी।

II) कृषि पशु-पालन के बाद कृषि ऋग्वैदिक आर्यों का प्रमुख उद्यम था। खेतों को बैल और हल द्वारा जोतते थे। जूती हुई भूमि को ‘उर्वर’ या ‘क्षेत्र’ कहते थे। हलों को छ:, आठ, और बारह बैलों द्वारा खींचने का भी वर्णन मिलता है। वे खाद का प्रयोग भी जानते थे। नदियों, कुओं, तालाबों और नहरों के पानी से सिंचाई की जाती थी। ऋग्वेद में फसलों को हंसिया से काटकर फिर अन्न को अलग-अलग करने का उल्लेख मिलता है। फसलों को क्षति पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़ों, पक्षियों आदि का भी ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है। साधारणत: कृषि वर्षा के पानी पर निर्भर होती थी। अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि से फसलें नष्ट हो जाती थी। अनेक मंत्रों में देवताओं से वर्षा के लिए प्रार्थना की गई है।

III) व्यापार तथा उद्योग- ऋग्वेद में विभिन्न प्रकार के गृह-उद्योगों का वर्णन मिलता है। सूत कातना एवं वस्र बनाना को ऋग्वैदिक आर्यों का प्रमुख उद्योग था। ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था में ‘लक्षण’ या बढ़ई का विशेष महत्व था। उन्हें लोहे का ज्ञान था और वे लोहे से अस्त्र-शस्रों का निर्माण करते थे। ‘कर्मकार’ या लुहार का भी ऋग्वैदिककालीन अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था। इनके अतिरिक्त ऋग्वेद में ‘हिरण्यकार’ या सुनार, चर्मकार और कुंभार का भी उल्लेख मिलता है।

ऋग्वेदिक आर्य व्यापार करते थे। आंतरिक व्यापार गाड़ियों और नावों द्वारा होता था। बड़ी-बड़ी नौकाओं द्वारा व्यापार का उल्लेख मिलता है। साधारणत: वस्तु विनिमय का प्रचलन था। परंतु निष्क (एक प्रकार का आभूषण) का प्रयोग मुद्रा के रूप में होता था विदेशों से भी व्यापार होता था। सामुद्रिक यात्राओं का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में ऋण और ब्याज का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन भारत का इतिहास

सिंधु घाटी सभ्यता

  • इतिहास का पिता किसे समझा जाता है—हेरोडोटस 
  • जिस काल में मानव की घटनाओं का कोई लिखित वर्णन नहीं होता, उस काल को क्या कहा जाता है—प्रागैतिहासिक काल 
  • मानव जीवन की घटनाओं का लिखित वर्णन क्या कहलाता है—इतिहास 
  • आग का अविष्कार किस युग में हुआ—पुरापाषण युग में 
  • पुरापाषण युग में मानव की जीविका का मुख्य आधार क्या था—शिकार करना 
  • पहिए का अविष्कार किस युग में हुआ—नवपाषण युग में 
  • हड़प्पा सभ्यता का प्रचलित नाम कौन-सा है—सिंधु घाटी की सभ्यता 
  • सिंधु की सभ्यता का काल क्या माना जाता है—2500 ई. पू. से 1750 ई.पू. 
  • सिंधु की घाटी सभ्यता में सर्वप्रथम घोड़े के अवशेष कहाँ मिले—सुरकोटदा 
  • सिंधु की घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था—व्यापार 
  • हड़प्पा की सभ्यता किस युग की सभ्यता थी—कांस्य युग 
  • सिंधु की घाटी सभ्यता में घर किससे बने थे—ईंटों से 
  • हड़प्पा के लोग कौन-सी फसल में सबसे आगे थे—कपास 
  • हड़प्पा की सभ्यता की खोज सर्वप्रथम किसने की—दयाराम साहनी
  • सिंधु सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह कौन-सा था—लोथल (गुजरात)
  • सिंधु की घाटी सभ्यता का स्थल ‘कालीबंगा’ किस प्रदेश में है— राजस्थान में
  • हड़प्पा की सभ्यता की खोज किस वर्ष हुई थी—1921 ई. 
  • हड़प्पा के लोगों की सामाजिक पद्धति कैसी थी—उचित समतावादी 
  • नखलिस्तान सिंधु सभ्यता के किस स्थल को कहा गया है—मोहनजोदड़ो 
  • हड़प्पा की सभ्यता में हल से खेत जोतने का साक्ष्य कहाँ मिला—कालीबंगा 
  • सैंधव सभ्यता की ईंटों का अलंकरण किस स्थान से प्राप्त हुआ—कालीबंगा 
  • सिंधु की सभ्यता में एक बड़ा स्नानघर कहाँ मिला—मोहनजोदड़ो में 
  • सिंधु सभ्यता की मुद्रा पर किस देवता का चित्र अंकित था—आघशिव 
  • मोहनजोदड़ो को एक अन्य किस नाम से जाना जाता है—मृतकों का टीला 
  • सैंधव स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त मोहरों पर किस पशु का प्रकीर्णन सर्वाधिक हुआ—बैल 
  • सिन्धु सभ्यता का कौन-सा स्थान भारत में स्थित है—लोथल 
  • भारत में खोजा गया सबसे पहला पुराना शहर कौन-सा था—हड़प्पा 
  • भारत में चाँदी की उपलब्धता के साक्ष्य कहाँ मिले—हड़प्पा की संस्कृति में 
  • मांडा किस नदी पर स्थित था—चिनाब पर 
  • हड़प्पा की सभ्यता का प्रमुख स्थल रोपड़ किस नदी पर स्थित था—सतलज नदी 
  • हड़प्पा में एक अच्छा जलप्रबंधन का पता किस स्थान से चलता है—धोलावीरा से 
  • सिंधु सभ्यता के लोग मिट्टी के बर्तनों पर किस रंग का प्रयोग करते थे—लाल रंग 
  • सिंधु घाटी की सभ्यता किस युग में थी—आद्य-ऐतिहासिक युग में 
  • सिंधु घाटी का सभ्यता की खोज में जिन दो भारतीय लोगों के नाम जुड़े हैं, वे कौन हैं—दयाराम साहनी और आर.डी. बनर्जी 
  • सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख फसल कौन-सी थी—जौ एवं गेहूँ 
  • हड़प्पा की समकालीन सभ्यता रंगपुर कहाँ है—सौराष्ट्र में 
  • हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई किसने कराई—सर जॉन मार्शल 
  • सिंधु सभ्यता के लोग सबसे अधिक किस देवता में विश्वास रखते थे—मातृशक्ति 
  • हड़प्पा की सभ्यता में मोहरे किससे बनी थी—सेलखड़ी से 
  • किस स्थान से नृत्य मुद्रा वाली स्त्री की कांस्य मूर्ति प्राप्त हुई—मोहनजोदड़ो से 
  • मोहनजोदड़ो इस समय कहाँ स्थित है— सिंध, पाकिस्तान
  • हड़प्पावासियों ने सर्वप्रथम किस धातु का प्रयोग किया—ताँबे का 
  • स्वतंत्रता के बाद भारत में हड़प्पा के युग के स्थानों की खोज सबसे अधिक किस राज्य में हुई—गुजरात 
  • हड़प्पा के निवासी किस धातु से परिचित नहीं थे—लोह से 
  • हड़प्पा की सभ्यता किस युग की सभ्यता थी—ताम्रयुग 
  • हड़प्पा का प्रमुख नगर कालीबंगन किस राज्य में है—राजस्थान में 
  • हड़प्पा के निवासी किस खेल में रूचि रखते थे—शतरंज 
  • हड़प्पा के किस नगर को ‘सिंध का बाग’ कहा जाता था—मोहनजोदड़ो को 
  • मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ क्या है—मृतकों का टीला 
  • हड़प्पा के निवासी घरों एवं नगरों के विन्यास के लिए किस पद्धति को अपनाते थे—ग्रीड पद्धति को 

भारत की प्रस्तर युगीन संस्कृतियाँ

इस काल का इतिहास पूर्णतः पुरातात्विक साधनों पर निर्भर है, इस काल का कोई लिखित साधन उपलब्ध नहीं है। पुरातत्वविदों ने इस काल को तीन भागों में विभाजित किया है:

  • पूरा पाषाण काल

इस काल में मानव खाद्यान्न संग्रह के द्वारा अथवा पशुओं का शिकार करके जीवन यापन करता था। उनके निवास के प्रमाण ‘शैलाश्रयों’ के रूप में मिले हैं। इनके औजार और हथियार न परिष्कृत है न तीक्ष्ण हैं। इन्होंने कुल्हाड़ी काटने का औजार पत्तर, तक्षणी, खुरचनी, छेदनी, बनाना सीख लिया था। इस काल के अंत में चकमक का आविष्कार भी हो गया था।

हड्डियों के अवशेषों एवं शैलाश्रयों की कलाकृतियों से इस काल में उपलब्ध पशुओं के विषय में जानकारी मिलती है कि वे बन्दर, जिराफ, हिरण, बकरी, भैंस, गाय, बैल, नीलगाय, सूअर, बारहसिंगा, सांभर, गैंडा, हाथी, आदि से भिज्ञ थे। जलीय जीवों में आदिमानव कछुओं एवं मछलियों से परिचित हो गया था। वनस्पतियों में वह विभिन्न प्रकार के फलों, फूलों, कंदमूल के अतिरिक्त मधु (शहद) के छत्तों से शहद निकालने में निपुण था। वह कन्दराओं में रहता था जिन्हें शैलाश्रय कहा गया है।

इस काल के मानव के अवशेष पश्चिमोत्तर भारत में सोहन घाटी में बड़े व्यापक स्तर पर प्राप्त हुए हैं। बेलन नदी घाटी, नर्मदा नदी घाटी, लूनी नदी घाटी, चम्बल नदी घाटी, आदि में पुरातात्विक बस्तियां प्राप्त हुई हैं। इसी प्रकार दक्षिण भारत में गोदावरी व कृष्णा नदी घाटियों, पूर्वी भारत में दामोदर, स्वर्णरेखा, महानदी के डेल्टा क्षेत्रों में पूरा-पाषणयुगीन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। भोपाल के समीप स्थित ‘भीमबेटका’ से इस काल की अनेक कलाकृतियाँ उस शैलाश्रय में चित्रित हैं जिनसे ज्ञात होता है कि वे शैलाश्रयों का उपयोग स्थायी निवास के लिये करते थे।

नवासा, कोरेगांव, चंदौली, शिकारपुर, आदि में भी पूरा-पाषाणयुगीन मानव जीवन के चिन्ह प्राप्त हुए हैं।

  • मध्य-पाषाण काल

इस काल में मानव जीवन में अपेक्षाकृत अधिक स्थायित्व आने लगा और उसके संचरण क्षेत्र में भी विस्तार हुआ। इसलिए इस काल में अनेक नवीन क्षेत्रों में भी पाषाण संस्कृति का उद्भव मिलता है। इस काल में मनुष्य पशु-पालक भी हो गया। इसके अतिरिक्त आखेट की प्रविधि में भी परिष्कार हुआ। वह पूरा-पाषाण काल के औजारों-हथियारों की अपेक्षा तीक्ष्ण औजारों-हथियारों का उपयोग कर गतिमान पशुओं का भी शिकार कर लेता था। इस काल के तिकोने धार वाले हथियार, नुकीले हथियार बहुतायत से मिले है।

मध्य-पाषाणयुगीन बस्तियां राजस्थान से लेकर मेघालय तक, उत्तर प्रदेश से लेकर कृष्णा नदी तट तक प्राप्त हुई है। बागोर, तिलवार (राजस्थान में) इस युग के प्रमुख स्थल हैं। बागोर में मध्य पाषाण युग  में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। गुजरात में लंघनाज, बलसाना तथा आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) से भी पशुपालन के साक्ष्य मिले हैं। संगनकल (कर्नाटक), रेणीगुंटा (आंध्र प्रदेश), तिन्नेवेली (तमिलनाडु), मयुरभंज (बिहार), सेबालगिरी (मेघालय) से इस काल के पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं।

  • नव-पाषाण काल

नव-पाषाण काल के प्रथम प्रस्तर उपकरण उत्तर प्रदेश की टोंस नदी घाटी से १८६० ई. में लेन्मसुरियर ने प्राप्त किये थे।

नव-पाषाणयुगीन प्राचीनतम बस्ती मेहरगढ़ में प्राप्त हुई है जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है। मेहरगढ़ में कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं तथा कच्चे घरों के साक्ष्य भी मिले हैं। मेहरगढ़ में रहने वाले नव-पाषाणयुगीन लोग गेहूं, जौ और कपास उत्पन्न करते थे।

नव-पाषाणयुगीन स्थल बुर्जहोम एवं गुफ्फकराल (कश्मीर प्रांत में) से अनेक गड्ढाघर और अनेक मृदभांड तथा प्रस्तर एवं हड्डी के अनेक औजार मिले हैं। बुर्जहोम से प्राप्त कब्रों में पालतू कुत्तों को मालिक के साथ दफनाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहीं से कृषि व पशुपालन के साक्ष्य भी मिले हैं।

चिरांद (बिहार प्रांत) नामक नव-पाषाणयुगीन स्थल से प्रचुर मात्रा में हड्डी के उपकरण मिले हैं, ये उपकरण अधिकांशतः हिरण के सींगों से निर्मित हैं। कोल्डिहवा (इलाहाबाद के समीप) नव-पाषाण पुरास्थल से चावल का प्राचीनतम साक्ष्य (लगभग ६००० ई. पू.) मिला है।

नव-पाषाणयुगीन मानव सर्वाधिक प्राचीन कृषक समुदाय के थे वे मिट्टी और सरकंडे के बने गोलाकार अथवा आयताकार घरों में निवास करते थे।

दक्षिण भारत में नव-पाषाणयुगीन मुख्य स्थल बेलारी है जो कर्नाटक प्रांत में स्थित है। पिकलीहल नामक नव-पाषाणयुगीन स्थल (कर्नाटक में) से शंख के ढेर और निवास स्थान दोनो पाए गए हैं। नव-पाषाण काल से ही कुम्भकारी के प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं अर्थात कुम्भकारी इसी काल से प्रारंभ हुई थी।

नव-पाषाण काल की प्रमुख उपलब्धि कही जा सकती है –

१) खाद्य उत्पादन का आविष्कार

२) पशुओं की उपयोग की जानकारी

३) स्थिर ग्राम्य जीवन का विकास।

NOTE: अगर यहाँ दी गयी जानकारी में कुछ गलत हैं या कुछ और आप जोड़ना चाहते हैं तो हमें COMMENT में लिखे. हम इसे अपडेट करते रहेंगे. 

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