वैदिक कालीन धार्मिक अवस्था

आर्यों के धार्मिक विचार, विश्वास और आस्था की झलक हमें ऋग्वेद से प्राप्त होती है। धार्मिक मतभेद के कारण ही भारतीय आर्य ईरान छोड़कर भारत में बस गए थे। उनके धर्म को ‘देवधर्म’ कहा गया। भारतवर्ष में धीरे-धीरे उनके धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों का विकास हुआ। सरल ह्रदय आर्य प्रकृति के संपर्क में आया। उसकी रहस्यमयी शक्ति को देखकर वह आश्चर्यचकित और भयभीत हुआ। उसने उसकी आराधना और उपासना की। कालांतर में उसने प्रकृति के रहस्यमय स्वरूप का मानवीकरण कर डाला और उन्हें देवी-देवताओं का रूप दे डाला। वास्तव में ‘देवता’ का अर्थ ‘प्रकाश का ज्ञान देने वाला’ होता है। ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख मिलता है जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

१ आकाशवाणी देवता- द्यौ, वरुण, मित्र, सूर्य, सविता, उषा इत्यादि।

२ अंतरिक्षवासी देवता- इंद्र, रूद्र, वायु, मरुत इत्यादि।

३ पृथ्वीवासी देता- पृथ्वी, अग्नि,सोम, बृहस्पति, सरस्वती इत्यादि।

देवताओं को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए वैदिक आर्य उनकी स्तुति तथा यज्ञ करते थे। पशुबलि भी अर्पित करते थे। परंतु उन्होंने किसी देवता को प्रमुखता प्रदान नहीं की, सभी उनके लिए पूज्य थे, शक्तिशाली थे। इस प्रकार ‘बहुदेवतावाद’ का विकास हआ। परंतु आर्यों की जिज्ञासा यहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अनुभव किया कि इन समस्त देवताओं के ऊपर एक सर्वोच्च सत्ता, एक परम तत्व है। इसको वैदिक ऋषियों ने विभिन्न नामों – ‘हिरण्यगर्भा’, ‘प्रजापति’ तथा ‘विश्वकर्मा’ – से अभिव्यक्त किया और यह प्रतिपादित किया कि ‘सत्’ एक ही है। इस प्रकार उन्होंने ‘एकेश्वरवाद’ की परिकल्पना प्रस्तुत की।

ऋग्वेद में पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक का वर्णन मिलता है। वे आत्मा तथा पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। ऋग्वेद में अमरता का उल्लेख मिलता है। परंतु वैराग्य और मोक्ष में उनकी आस्था नहीं थी। उन्होंने नैतिकता पर विशेष जोर दिया।

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