स्वतंत्रता सेनानी और जननायक बिरसा मुंडा

Birsa Munda Biography

बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे जिनकी ख्याति अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में  काफी हुयी थी। उनके द्वारा चलाया जाने वाला सहस्राब्दवादी आंदोलन ने बिहार और झारखंड में खूब प्रभाव डाला था। केवल 25 वर्ष के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल कर लिए थे कि आज भी भारत की जनता उन्हें याद करती है और भारतीय संसद में एकमात्र आदिवासी नेता बिरसा मुंडा का चित्र टंगा हुआ है।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था। मुंडा रीती रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था। उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहा वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे। उसके बाद फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया।

बिरसा का परिवार वैसे तो घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करता था लेकिन उनका अधिकांश बचपन चल्कड़ में बीता था। बिरसा बचपन से अपने दोस्तों के साथ रेत में खेलते रहते थे और थोडा बड़ा होने पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था। जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए बाँसुरी बजाया करते थे और कुछ दिनों बाँसुरी बजाने में उस्ताद हो गये थे। उन्होंने कद्दू से एक एक तार वाला वादक यंत्र तुइला बनाया था जिसे भी वो बजाया करते थे। उनके जीवन के कुछ रोमांचक पल अखारा गाँव में बीते थे।

गरीबी के इस दौर में बिरसा को उनके मामा के गाँव अयुभातु  भेज दिया गया। अयुभातु में बिरसा दो साल तक रहे और वहा के स्कूल में पढने गये थे। बिरसा पढाई में बहुत होशियार थे इसलिए स्कूल चलाने वाले जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने को कहा। अब उस समय क्रिस्चियन स्कूल में प्रवेश लेने के लिए इसाई धर्म अपनाना जरुरी हुआ करता था तो बिरसा ने धर्म परिवर्तन कर अपना नाम बिरसा डेविड रख दिया जो बाद में बिरसा दाउद हो गया था।  कुछ वर्षो तक पढाई करने के बाद उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया। अब स्कूल छोड़ने के बाद वो वैष्णो भक्त आनन्द पांडे के प्रभाव में आये और उन्होंने हिन्दू धर्म की शिक्षा ली। उन्होंने रामायण , महाभारत और अन्य हिन्दू महाकाव्य पढ़े।

1886 से 1890 का दौर उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ रहा जिसमे उन्होंने इसाई धर्म के प्रभाव में अपने धर्म का अंतर समझा। उस मस्य सरदार आंदोलन शुरू हो गया था इसलिए उनके पिता ने उनको स्कूल छुडवा दिया था क्योंकि वो इसाई स्कूलों का विरोध कर रही थी। अब सरदार आन्दोलन की वजह से उनके दिमाग में इसाइयो के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हो गयी थे। बिरसा भी सरदार आन्दोलन में शामिल हो गये थे और अपने पारम्परिक रीती रिवाजो के लिए लड़ना शुरू हो गये थे। अब बिरसा मुंडा आदिवासियों के जमीन छीनने , लोगो को इसाई बनाने और युवतियों को दलालों द्वारा उठा ले जाने वाले कुकृत्यो को अपनी आँखों से देखा था जिससे उनके मन में अंग्रेजो के अनाचार के प्रति क्रोध की ज्वाला भडक उठी थी।

अब वो अपने विद्रोह में इतने उग्र हो गये थे कि आदिवासी जनता उनको भगवान मानने लगी थी और आज भी आदिवासी जनता बिरसा को भगवान बिरसा मुंडा के नाम से पूजती है। उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया और अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को समझाया था। उन्होंने गाय की पूजा करने और गौ-हत्या का विरोध करने की लोगो को सलाह दी। अब उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारा दिया “रानी का शाषन खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो ”। उनके इस नारे को आज भी भारत के आदिवासी इलाको में याद किया जता है। अंग्रेजो ने आदिवासी कृषि प्रणाली में बदलाव किय जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान होता था |1895 में लगान माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध मोर्चा खोल दिय था।

बिरसा मुंडा ने सन 1900 में अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा करते हुए कहा “हम ब्रिटिश शाशन तन्त्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते है और कभी अंग्रेज नियमो का पालन नही करेंगे, ओ गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजो, तुम्हारा हमारे देश में क्या काम? छोटा नागपुर सदियों से हमारा है और तुम इसे हमसे छीन नही सकते है इसलिए बेहतर है कि वापस अपने देश लौट जाओ वरना लाशो के ढेर लगा दिए जायेंगे ”। इस घोषणा को एक घोषणा पत्र में अंग्रेजो के पास भेजा गया तो अंग्रेजो ने अपनी सेना बिरसा को पकड़ने के लिए रवाना कर दी। अंग्रेज सरकार ने बिरसा की गिरफ्तारी पर 500 रूपये का इनाम रखा था। अब बिरसा भी तीर कमान और भालो के साथ युद्ध की तैयारियों में लग गये।

अब बिरसा के इसके विद्रोह में लोगो को इकट्ठा किया और उनके नेतृत्व में आदिवासियों का विशाल विद्रोह हुआ था। अंग्रेज सरकार ने विद्रोह का दमन करने के लिए 3 फरवरी 1900 को मुंडा को गिरफ्तार कर लिया जब वो अपनी आदिवासी गुरिल्ला सेना के साथ जंगल में सो रहे थे। उस समय 460 आदिवासियों को भी उनके साथ गिरफ्तार किया गया।  9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी रहस्यमयी तरीके से मौत हो गयी और अंग्रेज सरकार ने मौत का कारण हैजा बताया था जबकि उनमे हैजा के कोई लक्षण नही थे। केवल 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऐसा काम कर दिया कि आज भी बिहार ,झारखंड और उडीसा की आदिवासी जनता उनको याद करती है और उनके नाम पर कई शिक्षण संस्थानों के नाम रखे गये है।

Note: यहाँ पर दी गयी जानकारी इंटरनेट के मध्यम से ली गयी है।

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स्थायी बंदोबस्त

पृष्ठभूमिः बंगाल की लगान व्यवस्था 1765 से ही कम्पनी के लिये एक समस्या बनी हुयी थी। क्लाइव ने इस व्यवस्था में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया तथा उसके काल में वार्षिक लगान व्यवस्था ही जारी रही। बाद में वारेन हेस्टिंग्स ने लगन व्यवस्था में सुधार के लिए इजारेदारी प्रथा लागु की किन्तु इससे समस्या सुलझने के बजाय और उलझ गयी। इस व्यवस्था के दोषपूर्ण प्रेअव्धनों के कारण कृषक बर्बाद होने लगे तथा कृषि का पराभव होने लगा।

1886 में जब लार्ड कार्नवालिस गवर्नर-जनरल बनकर भारत आया उस समय कम्पनी की राजस्व व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी तथा उस पर पर्याप्त वाद-विवाद चल रहा था। अतः उसके सम्मुख सबसे प्रमुख कार्य कम्पनी की लगान व्यवस्था में सुधार करना था। प्रति वर्ष ठेके की व्यवस्था के कारण राजस्व वसूली में आयी अस्थिरता एवं अन्य दोषों के कारण कम्पनी के डायरेक्टरों ने कार्नवालिस को आदेश दिया कि वह सर्वप्रथम लगान व्यवस्था की दुरुस्त करे तथा वार्षिक ठेके की व्यवस्था से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिये जमींदारों से स्थायी समझौता कर ले। डायरेक्टरों का यही आदेश अंत में स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था का सबसे मुख्य कारण बना। इसके फलस्वरूप भू-राजस्व या लगान के संबंध में जो व्यवस्था की गयी, उसे ‘जर्मीदारी व्यवस्था’ या ‘इस्तमरारी व्यवस्था’ या ‘स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था’ के नाम से जाना जाता है। यद्यपि प्रारंभ में इस व्यवस्था से संबंधित कुछ समस्यायें थीं। जैसे-

  1. समझौता किससे किया जाये? किसान से या जमींदार से।
  2. राज्य की पैदावार का कितना भाग लगान के रूप में प्राप्त हो। और
  3. यह समझौता कुछ वर्षों के लिये किया जाये या स्थायी रूप से।

प्रारंभ में इन समस्याओं के संबंध में जान शोर, चार्ल्स ग्रांट एवं स्वयं कार्नवालिस में तीव्र मतभेद थे। अतः इन समस्याओं पर पर्याप्त एवं पूर्ण विचार किया गया। अंत में प्रधानमंत्री पिट्, बोर्ड आफ कंट्रोल के सभापति डण्डास, कम्पनी के डायरेक्टर्स, जॉन शोर, चार्ल्स ग्रांट तथा कार्नवालिस की आपसी सहमति से 1790 में जमींदारों के साथ 10 वर्ष के लिये समझौता किया गया, जिसे 22 मार्च 1793 में स्थायी कर दिया गया।

यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यू.पी. के बनारस प्रखण्ड तथा उत्तरी कर्नाटक में लागू की गयी। इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत भाग सम्मिलित था।

विशेषतायें: इसकी निम्न विशेषतायें थीं-

  1. जमीदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया। भूमि पर उनका अधिकार पैतृक एवं हस्तांतरणीय था। उन्हें उनकी भूमि से तब तक पृथक नहीं किया जा सकता था, जब तक वे अपना निश्चित लगान सरकार को देते रहें।
  2. किसानों को मात्र रैयतों का नीचा दर्जा दिया गया तथा उनसे भूमि सम्बन्धी तथा अन्य परम्परागत अधिकारों को छीन लिया गया।
  3. जमींदार, भूमि के स्वामी होने के कारण भूमि को खरीद या बेच सकते थे।
  4. जमींदार, अपने जीवनकाल में या वसीयत द्वारा अपनी जमींदारी अपने वैध उत्तराधिकारी को दे सकते थे।
  5. जमींदारों से लगान सदैव के लिये निश्चित कर दिया गया।
  6. सरकार का किसानों से कोई प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था।
  7. जमीदारों को किसानों से वसूल किये गये भू-राजस्व की कुल रकम का 10/11 भाग कम्पनी को देना था तथा 1/11 भाग स्वयं रखना था।
  8. तय की गयी रकम से अधिक वसूली करने पर, उसे रखने का अधिकार जमींदारों को दे दिया गया।
  9. यदि कोई जमींदार निश्चित तारीख तक, भू-राजस्व की निर्धारित राशि जमा नहीं करता था तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
  10. कम्पनी की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुयी।

उद्देश्यः कंपनी द्वारा भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था को लागू करने के मुख्य दो उद्देश्य थे–

  • इंग्लैण्ड की तरह, भारत में जमींदारों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना, जो अंग्रेजी साम्राज्य के लिये सामाजिक आधार का कार्य कर सके। भारत में कम्पनी के फैलते साम्राज्य के मद्देनजर अंग्रेजों ने महसूस किया कि भारत जैसे विशाल देश पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये उनके पास एक ऐसा वर्ग होना चाहिये, जो अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान कर सके। इसीलिये अंग्रेजों ने जमींदारों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो कम्पनी की लूट-खसोट से थोड़ा सा हिस्सा प्राप्त कर संतुष्ट हो जाये तथा कम्पनी को सामाजिक आधार प्रदान करे।
  • कम्पनी की आय में वृद्धि करना। चूंकि भू-राजस्व कम्पनी की आय का अत्यंत प्रमुख साधन था अतः कम्पनी अधिक से राजस्व प्राप्त करना चाहती थी।

स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था के लाभ व हानियां

स्थायी बंदोस्त व्यवस्था के संबंध में इतिह्रासकारों ने अलग-अलग राय प्रकट की है। कुछ इतिह्रासकारों ने इसे साहसी एवं बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य माना है तो कुछ ने इसका तीव्र विरोध किया है-

तुलनात्मक तौर पर इस व्यवस्था से होने वाले लाभ व हानियां इस प्रकार थीं-

लाभ: जमींदारों को

  1.  इस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ जमींदारों को ही हुआ। वे स्थायी रूप से भूमि के मालिक बन गये।
  2. लगान की एक निश्चित रकम सरकार को देने के पश्चात काफी बड़ी धनराशि जमींदारों को प्राप्त होने लगी।
  3. अधिक आय से कालांतर में जमींदार अत्यधिक समृद्ध हो गये तथा वे सुखमय जीवन व्यतीत करने लगे। बहुत से जमींदार तो गांव छोड़कर शहरों में बसे गए।

लाभ: सरकार को

  1.  जमींदारों के रूप में सरकार को ऐसा वर्ग प्राप्त हो गया, जो हर परिस्थिति में सरकार का साथ देने को तैयार था। जमींदारों के इस वर्ग ने अंग्रेजी सत्ता को सामाजिक आधार प्रदान किया तथा कई अवसरों पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किये गये विद्रोहों को कुचलने में सरकार की सहायता की। कालांतर में इन जमींदारों ने अनेक संस्थायें (जैसे-लैंड ओनर एसोसिएशन, लैंड होल्डर्स एसोसिएशन इत्यादि) बनायीं तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में सरकार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा घोषित की।
  2. सरकार की आय में अत्यधिक वृद्धि हो गयी।
  3. सरकार की आय निश्चित हो गयी, जिससे अपना बजट तैयार करने में उसे आसानी हुयी।
  4. सरकार को प्रतिवर्ष राजस्व की दरें तय करने एवं ठेके देने के झंझट से मुक्ति मिल गयी।
  5. कम्पनी के कर्मचारियों को लगान व्यवस्था से मुक्ति मिल गयी, जिससे वे कम्पनी के व्यापार की ओर अधिक ध्यान दे सके। उसके प्रशासनिक व्यय में भी कमी आयी तथा प्रशासनिक कुशलता बढ़ी।

अन्य :

  1. राजस्व में वृद्धि की संभावनाओं के कारण जमींदारों ने कृषि में स्थायी रूप से रुचि लेनी प्रारंभ कर दी तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि के अनेक प्रयास किये। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी।
  2. कृषि में उन्नति होने से व्यापार एवं उद्योग की प्रगति हुयी।
  3. जमींदारों से न्याय एवं शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी छीन ली गयी, जिससे उनका ध्यान मुख्यतया कृषि के विकास में लगा तथा इससे सूबों की आर्थिक संपन्नता में वृद्धि हुयी।
  4. सूबों की आर्थिक संपन्नता से सरकार को लाभ हुआ।

हानियां :

  1. इस व्यवस्था से सबसे अधिक हानि किसानों को हुयी। इससे उनके भूमि संबंधी तथा अन्य परम्परागत अधिकार छीन लिये गये तथा वे केवल खेतिहर मजदूर बन कर रह गये।
  2. किसानों को जमींदारों के अत्याचारों व शोषण का सामना करना पड़ा तथा वे पूर्णतया जमीदारों की दया पर निर्भर हो गये।
  3. वे जमींदार, जो राजस्व वसूली की उगाही में उदार थे, भू-राजस्व की उच्च दरें सरकार को समय पर नहीं अदा कर सके, उन्हें बेरहमी के साथ बेदखल कर दिया गया तथा उनकी जमींदारी नीलाम कर दी गयी।
  4. जमीदारों के समृद्ध होने से वे विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। जिससे सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुयी।
  5. स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने कालांतर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष को भी हानि पहुंचायी। जर्मींदारों का यह वर्ग स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेज भक्त बना रहा तथा कई अवसरों पर तो उसने राष्ट्रवादियों के विरुद्ध सरकार की मदद भी की।
  6. इस व्यवस्था से किसान दिनों-दिन निर्धन होते गये तथा उनमें सरकार तथा जमींदारों के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा। कालांतर में होने वाले कृषक आंदोलनों में से कुछ के लिये इस असंतोष ने भी योगदान दिया। इस प्रकार इस व्यवस्था ने कुछ कृषक आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभायी।
  7. इस व्यवस्था से सरकार को भी हानि हुयी क्योंकि कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उसकी आय में कोई वृद्धि नहीं हुयी तथा उसका सम्पूर्ण लाभ केवल जमींदारों को ही प्राप्त होता रहा।

इस प्रकार स्पष्ट है कि स्थायी बंदोबस्त से सर्वाधिक लाभ जमींदारों को हुआ। यद्यपि सरकार की आय भी बढ़ी किंतु अन्य दृष्टिकोणों से इससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक हुयी। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण लाभ 15-20 वर्ष या इससे थोड़े अधिक समय के बंदोबस्त द्वारा प्राप्त किये जा सकते थे और इस बंदोबस्त को स्थायी करने की आवश्यकता नहीं थी।

इस प्रकार स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था कुछ समय के लिए भले ही लाभदायक रही हो किन्तु रही हो किंतु इससे कोई दीर्घकालिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ। इसीलिये कुछ स्थानों के अलावा अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को भारत के अन्य भागों में लागू नहीं किया। स्वतंत्रता के पश्चात सभी स्थानों से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

महालबाड़ी पद्धति

लार्ड हेस्टिंग्स के काल में ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की वसूली के लिये भू-राजस्व व्यवस्था का संशोधित रूप लागू किया, जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त कहा गया। यह व्यवस्था मध्य प्रांत, यू.पी. (आगरा) एवं पंजाब में लागू की गयी तथा इस व्यवस्था के अंतर्गत 30 प्रतिशत भूमि आयी।

इस व्यवस्था में भू-राजस्व का बंदोबस्त एक पूरे गांव या महाल में जमींदारों या उन प्रधानों के साथ किया गया, जो सामूहिक रूप से पूरे गांव या महाल के प्रमुख होने का दावा करते थे। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से भूमि पूरे गांव या महाल की मानी जाती थी किंतु व्यावहारिक रूप में किसान महाल की भूमि को आपस में विभाजित कर लेते थे तथा लगान, महाल के प्रमुख के पास जमा कर देते थे। तदुपरांत ये महाल-प्रमुख, लगान को सरकार के पास जमा करते थे। मुखिया या महाल प्रमुख को यह अधिकार था कि वह लगान अदा न करने वाले किसान को उसकी भूमि से बेदखल कर सकता था। इस व्यवस्था में लगान का निर्धारण महाल या सम्पूर्ण गांव के उत्पादन के आधार पर किया जाता था।

महालवाड़ी बंदोबस्त का सबसे प्रमुख दोष यह था कि इसने महाल के मुखिया या प्रधान को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। किसानों को भूमि से बेदखल कर देने के अधिकार से उनकी शक्ति अत्यधिक बढ़ गयी तथा वे यदाकदा मुखियाओं द्वारा इस अधिकार का दुरुपयोग किया जाने लगा। इस व्यवस्था का दूसरा दोष यह था कि इससे सरकार एवं किसानों के प्रत्यक्ष संबंध बिल्कुल समाप्त हो गये।

इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा भारत में भू-राजस्व वसूलने की विभिन्न पद्धतियों को अपनाया गया। इन पद्धतियों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर लागू किया गया। किंतु इन सभी प्रयासों के पीछे अंग्रेजों का मूल उद्देश्य अधिक से अधिक भू-राजस्व को हड़प कर अपनी आय में वृद्धि करना था तथा किसानों की भलाई से उनका कोई संबंध नहीं था। इसके कारण धीरे-धीरे भारतीय कृषक वर्ग कंगाल होने लगा तथा भारतीय कृषि बर्बाद हो गयी।

रैयतवाड़ी व्यवस्था

स्थायी बंदोबस्त के पश्चात, ब्रिटिश सरकार ने भू-राजस्व की एक नयी पद्धति अपनायी, जिसे रैयतवाड़ी बंदोबस्त कहा जाता है। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर (1820-27) टॉमस मनरो द्वारा 1820 में प्रारंभ की गयी इस व्यवस्था को मद्रास, बम्बई एवं असम के कुछ भागों लागू किया गया। बम्बई में इस व्यवस्था को लागू करने में बंबई के तत्कालीन गवर्नर (1819-27) एल्फिन्सटन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भू-राजस्व की इस व्यवस्था में सरकार ने रैयतों अर्थात किसानों से सीधा बंदोबस्त किया। अब रैयतों को भूमि के मालिकाना हक तथा कब्जादारी अधिकार दे दिये गये तथा वे सीधे या व्यक्तिगत रूप से स्वयं सरकार को लगान अदा करने के लिये उत्तरदायी थे। इस व्यवस्था ने किसानों के भू-स्वामित्व की स्थापना की। इस प्रथा में जमींदारों के स्थान पर किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया। इस प्रणाली के अंतर्गत रैयतों से अलग-अलग समझौता कर लिया जाता था तथा भू-राजस्व का निर्धारण वास्तविक उपज की मात्रा पर न करके भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था ।

सरकार द्वारा इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य, बिचौलियों (जमीदारों) के वर्ग को समाप्त करना था। क्योंकि स्थायी बंदोबस्त में निश्चित राशि से अधिक वसूल की गयी सारी रकम जर्मींदारों द्वारा हड़प ली जाती थी तथा सरकार की आय में कोई वृद्धि नहीं होती थी। अतः आय में वृद्धि करने के लिये ही सरकार ने इस व्यवस्था को लागू किया ताकि वह बिचौलियों द्वारा रखी जाने वाली राशि को खुद हड़प सके। दूसरे शब्दों में इस व्यवस्था द्वारा सरकार स्थायी बंदोबस्त के दोषों को दूर करना चाहती थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत 51 प्रतिशत भूमि आयी। कम्पनी के अधिकारी भी इस व्यवस्था को लागू करने के पक्ष में थे क्योंकि उनका मानना था कि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में इतने बड़े जमींदार नहीं है कि उनसे स्थायी बंदोबस्त किया जा सके। इसलिये इन क्षेत्रों में रैयतवाड़ी व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है।

हालांकि इस व्यवस्था के बारे में यह तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था भारतीय कृषकों एवं भारतीय कृषि के अनुरूप है किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न थी। व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था से किसी भी प्रकार कम हानिकारक नहीं थी। इसने ग्रामीण समाज की सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया तथा जमींदारों का स्थान स्वयं ब्रिटिश सरकार ने ले लिया। सरकार ने अधिकाधिक राजस्व वसूलने के लिये मनमाने ढंग से भू-राजस्व का निर्धारण किया तथा किसानों को बलपूर्वक खेत जोतने को बाध्य किया।

रैयतवाड़ी व्यवस्था के अन्य दोष भी थे। इस व्यवस्था के तहत किसान का भूमि पर तब तक ही स्वामित्व रहता था, जब तक कि वह लगान की राशि सरकार को निश्चित समय के भीतर अदा करता रहे अन्यथा उसे भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। अधिकांश क्षेत्रों में लगान की दर अधिक थी अतः प्राकृतिक विपदा या अन्य किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर किसान लगान अदा नहीं कर पाता था तथा उसे अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ता था। इसके अलावा किसानों को लगान वसूलने वाले कर्मचारियों के दुर्व्यवहार का सामना भी करना पड़ता था।

18 सितंबर

 • ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 18 सितंबर वर्ष का 261 वाँ (लीप वर्ष में यह 262 वाँ) दिन है। साल में अभी और 104 दिन शेष हैं।


*18 सितंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ*


• 1180 – फिलिप अगुस्टस फ्रांस का राजा बना।

• 1615 – इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के एंबेसडर थामस रॉ जहाँगीर से मिलने सूरत पहुँचा।

• 1803 – अंग्रेजों ने ओडिशा के पुरी पर कब्ज़ा किया।

• 1809 – लंदन में रॉयल ऑपेरा हाउस खुला।

• 1851- न्यूयार्क टाइम्स अख़बार ने प्रकाशन शुरू किया।

• 1922 -हंगरी लीग ऑफ नेशंस में शामिल हुआ।

• 1926 – अमेरिका के मियामी में चक्रवाती तूफान से 250 लोगों की मौत।

• 1967 – नागालैंड ने अंग्रेज़ी को आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया।

• 1987 – अमेरिका और सोवियत संघ ने मध्यम दूरी के मिसाइल को हटाने के लिये हस्ताक्षर किये।

• 1988 – बर्मा ने अपना संविधान रद्द किया।

• 1986 – मुम्बई से पहली बार महिला चालकों ने जेट विमान उड़ाया।

• 1997 – सं.रा. अमेरिका ने ‘होलोग’ नाम से भूमिगत परमाणु परीक्षण किया, ओज़ोन परत की रक्षा के लिए 100 देशों ने सन् 2015 तक मिथाइल ब्रोमाइड का उत्पादन बन्द करने का निश्चय किया।

• 1998 – सं.रा. अमेरिका के ऊपर संयुक्त राष्ट्र का 1 अरब डॉलर बकाये की घोषणा।

• 2003 – ढाका-अगरतला बस सेवा शुरू।

• 2006 – रूसी राकेट सोयूज अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए रवाना। संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ में अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व वित्तमंत्री अशरफ़ गनी शामिल।

• 2007 – कनाडा में 1960 के दशक में जीवाश्‍म की खोज से तहलका मचाने वाले भारतीय जियोलॉजिस्‍ट जी.बी. मिश्रा को विशेष सम्‍मान से नवाजा गया।

• 2008- शोभना भरतिया एच.टी. मीडिया की अध्यक्ष नियुक्त हुई।

• 2009 – सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कम्पनी एच. सी. एल. के संस्थापक अध्यक्ष शिव नायर को ब्रिटेन के ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट बिजनेस पर्सन ऑफ द ईयर अवार्ड से सम्मानित किया गया। भारत ने लद्दाख क्षेत्र में अपनी एक और हवाई पट्टी खोली।


★18 सितंबर को जन्मे व्यक्ति

• 1906 – काका हाथरसी, भारतीय हास्य कवि

• 1931 – श्रीकांत वर्मा – हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार, गीतकार, समीक्षक और राजनीतिज्ञ।

• 1950 – शबाना आज़मी – हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री।

• 1979 – विनय राय, भारतीय अभिनेता

• 1983 – सनाया ईरानी, भारतीय अभिनेत्री

• 1900 – शिवसागर रामगुलाम – मॉरीशस के प्रथम मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री एवं छठे गवर्नर-जनरल थे।


★18 सितंबर को हुए निधन


• 2002 – शिवाजी सावंत – मराठी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार।

• 1992 – मुहम्मद हिदायतुल्लाह – भारत के पहले मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश, वे भारत के प्रथम कार्यवाहक राष्ट्रपति थे।

• 1961 – डैग हैमरस्क्जोंल्ड – संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव थे।

• 1953 – असित सेन – हिंदी फ़िल्मों के हास्य अभिनेता थे।

• 1957 – सारंगधर दास – स्वतंत्रता सेनानी थे।

• 1958 – भगवान दास – ‘भारत रत्न’ सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी और शिक्षा शास्त्री।

• 1930 – जोसेफ़ बैपटिस्टा – प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ तथा अधिवक्ता।

17 सितंबर को जन्मे व्यक्ति

​• 1864 – अनागारिक धर्मपाल

• 1867 – गगनेन्द्रनाथ टैगोर – प्रसिद्ध भारतीय व्यंग्य चित्रकार (कार्टूनिस्ट) थे।

• 1876 – शरतचंद्र चट्टोपाध्याय- बंगाली उपन्यासकार।

• 1879 – ई वी रामास्वामी नायकर- तमिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता।

• 1915 – मक़बूल फ़िदा हुसैन- प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार

• 1930 – लालगुड़ी जयरमण – भारत के प्रसिद्ध वायलिन।

• 1879 – पेरियार ई. वी. रामासामी – भारतीय समाज सुधारक

• 1945 – भक्ति कारु स्वामी – भारतीय आध्यात्मिक नेता

• 1950 – नरेंद्र मोदी- भारतीय राजनीतिज्ञ

• 1872 – वामनराव बलिराम लाखे – भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों में से एक।

• 1929 – अनंत पै – भारतीय शिक्षा शास्री, अमर चित्रकथा के संस्थापक थे।

आज का इतिहास 17 सितंबर

• ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 17 सितंबर वर्ष का 260 वाँ (लीप वर्ष में यह 261 वाँ) दिन है। साल में अभी और 105 दिन शेष हैं।
★17 सितंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ★

•1630- अमेरिका के बॉस्टन शहर की स्थापना।

• 1761- कोसाब्रोमा का युद्ध लड़ा गया।

• 1948- हैदराबाद रियासत का भारत में विलय।

• 1949- दक्षिण भारतीय राजनीतिक दल द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) की स्थापना।

• 1974- बंगलादेश, ग्रेनेडा और गिनी बिसाऊ संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल।

• 1982- भारत और सिलोन(श्रीलंका) के बीच पहला क्रिकेट टेस्ट मैच खेला गया।

• 1995 – चीन की राजधानी बीजिंग में ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत अंतिम चुनाव सम्पन्न।

• 1956- भारतीय तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग का गठन।

• 1957- मलेशिया संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुआ।

• 1999 – ओसामा बिन लादेन का भारत के विरुद्ध जेहाद का ऐलान।

• 2000 – जाफना प्राय:द्वीप का चवाक छेड़ी शहर लिट्टे से मुक्त।

• 2001 – अमेरिका ने स्पष्ट किया कि कश्मीर पर पाक के साथ कोई सौदेबाजी नहीं।

• 2002 – इराक ने संयुक्त राष्ट्र हथियार निरीक्षकों को बिना शर्त देश में आने की अनुमति दी।

• 2004 – यूरोपीय संसद ने मालदीव पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया।

• 2006 – हवाना में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का शिखर सम्मेलन शुरू। भारतीय वायु सेना की स्पेशल फ़ोर्स यूनिट गरुड़ कमांडो कांगो के शांति मिशन पर रवाना। गुटनिरपेक्ष देशों की दो दिवसीय शिखर बैठक हवाना में सम्पन्न। भारतीय प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने क्यूबा के अस्वस्थ राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से मुलाकात की। कांधार विमान अपहरण में अलकायदा के हाथ होने की पुष्टि। विश्व कप हॉकी में भारत को 11वां स्थान।

• 2008 – जहाजरानी राज्यमंत्री के. एच. मुनियप्पा ने विश्वकर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार एवं राष्ट्रीय संरक्षा पुरस्कार 2006 प्रदान किए।

• 2009 – केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने 123 भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के नाम अपनी वेबसाइट पर जारी किए। दिल्ली की दो और बिहार की 18 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव सम्पन्न हुए।

• 2011- न्यूयॉर्क के जुकोट्टी पार्क में वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन की शुरूआत।

मौर्यकाल

  1. सबसे प्राचीनतम राजवंश कौन-सा है— मौर्य वंश
  2. मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की— चंद्रगुप्त मौर्य
  3. मौर्य वंश की स्थापना कब की गई— 322 . पू.
  4. कौटिल्य/चाणक्य किसका प्रधानमंत्री था— चंद्रगुप्त मौर्य का
  5. चाणक्य का दूसरा नाम क्या था— विष्णु गुप्त
  6. चंदगुप्त के शासन विस्तार में सबसे अधिक मदद किसने की— चाणक्य ने
  7. किसकी तुलना मैकियावेली के ‘प्रिंस’ से की जाती है— कौटिल्य का अर्थशास्त्र
  8. किस शासक ने सिंहासन पर बैठने के लिए अपने बड़े भाई की हत्या की थी— अशोक
  9. सम्राट अशोक की उस पत्नी का नाम क्या था जिसने उसे प्रभावित किया था— कारुवाकी
  10. अशोक ने सभी शिलालेखों में एक रुपया से किस प्राकृत का प्रयोग किया था— मागधी
  11. बिंदुसार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अशोक को कहाँ भेजा था— तक्षशिला
  12. किस सम्राट का नाम ‘देवान प्रियादर्शी’ था— सम्राट अशोक
  13. किस राजा ने कलिंग के युद्ध में नरसंहार को देखकर बौद्ध धर्म अपना लिया था— अशोक ने
  14. कलिंग का युद्ध कब हुआ— 261 . पू.
  15. प्राचीन भारत का कौन-सा शासक था जिसने अपने अंतिम दिनों में जैनधर्म को अपना लिया था— चंद्रगुप्त मौर्य
  16. मौर्य साम्राज्य में कौन-सी मुद्रा प्रचलित थी— पण
  17. अशोक का उत्तराधिकारी कौन था— कुणाल
  18. अर्थशास्त्र का लेखक किसके समकालीन था— चंद्रगुप्त मौर्य
  19. मौर्य काल में शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र कौन-सा था— तक्षशिला
  20. यूनान के शासक सेल्यूकस ने अपने राजदूत मेगास्थनीज को किसके राज दरबार में भारत भेजा— चंद्रगुप्त मौर्य
  21. चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को कब पराजित किया— 305 . पू.
  22. मेगस्थनीज की पुस्तक का क्या नाम है— इंडिका
  23. किसके ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के विशिष्ट रूप का वर्णन हुआ है— विशाखदत्त के ग्रंथ में
  24. ‘मुद्राराक्षस’ के लेखक कौन है— विशाखदत्त
  25. किस स्त्रोत में पाटलिपुत्र के प्रशासन का वर्णन है— इंडिका
  26. अशोक के शिलालेखों में कौन-सी भाषा थी— पाकृत
    किस मौर्य राजा ने दक्कन पर विजय प्राप्त की थी— कुणाल ने
  27. मेगास्थनीज द्वारा अपनी पुस्तक में समाज को कितने भागों में बाँटा गया था— पाँच
  28. ‘अर्थशास्त्र’ किसके संबंधित है— राजनीतिक नीतियों से
  29. किस शासक ने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया— चंद्रगुप्त मौर्य ने
  30. पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त का महल किसका बना था— लकड़ी का
  31. किस अभिलेख से यह सिद्ध होता है कि चंद्रगुप्त का प्रभाव पश्चिम भारत तक फैला हुआ था— रुद्रदमन का जूनागढ़ अभिलेख
  32. सर्वप्रथम भारतीय साम्राज्य किसने स्थापित किया— चंद्रगुप्त मौर्य ने
  33. किस स्तंभ में अशोक ने स्वयं को मगध का सम्राट बताया है— भाब्रू स्तंभ
  34. उत्तराखंड में अशोक का शिलालेख कहाँ स्थित है— कालसी में
  35. अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला प्रथम अंग्रेज कौन था— जेम्स प्रिंसेप
  36. कलिंग युद्ध की विजय तथा क्षत्रियों का वर्णन किया शिलालेख में है— 13वें शिलालेख में (XIII)
  37. कौन-सा शासक जनता के संपर्क में रहता था— अशोक
  38. किस ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग किया गया है— मुद्राराक्षस
  39. किस राज्यादेश में अशोक के व्यक्तिगत नाम का उल्लेख मिलता है— मास्की
  40. श्रीनगर की स्थापना किस मौर्य शासक ने की— अशोक
  41. किस ग्रंथ में शुद्रों के लिए ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है— अर्थशास्त्र में
  42. किसने पाटलिपुत्र को ‘पोलिब्रोथा’ कहा था— मेगास्थनीज ने
  43. मौर्य काल में ‘एग्रनोमाई’ किसको कहा जाता था— सड़क निर्माण अधिकारी को
  44. अशोक के बारे में जानने के लिए महत्पूर्ण स्त्रोत क्या है— शिलालेख
  45. ‘भारतीय लिखने की कला नहीं जानते हैं’ यह किसने कहा था— मेगास्थनीज ने
  46. बिंदुसार की मृत्यु के समय अशोक एक प्रांत का गवर्नर था, वह प्रांत कौन-सा था— उज्जैन
  47. किसने अपने पुत्र व पुत्री को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार हेतु श्रीलंका भेजा— अशोक ने
  48. कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र कितने अभिकरणों में विभाजित है— 15
  49. अशोक का अभिलेख भारत के अलावा किस अन्य स्थान पर भी पाया गया है— अफगानिस्तान
  50. किस शिलालेख में अशोक ने घोषणा की, ‘‘सभी मनुष्य मेरे बच्चे है’’— प्रथम पृथक शिलालेख में
  51. किस स्थान से अशोक के शिलालेख के लिए पत्थर लिया जाता था— चुनार से
  52. किस महीने में मौर्यों का राजकोषीय वर्ष आरंभ होता था— आषाढ़ (जुलाई)
  53. किस जैन ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के जैन धर्म अपनाने का उल्लेख मिलता है— परिशिष्ट पर्व में
  54. चंद्रगुप्त मौर्य का संघर्ष किस यूनानी शासक से हुआ— सेल्यूकस से
  55. एरियन ने चंद्रगुप्त मौर्य को क्या नाम दिया— सैंड्रोकोट्स
  56. किस ग्रंथ में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए ‘कुलहीन’ शब्द का प्रयोग हुआ— मुद्राराक्षस
  57. किस ग्रंथ में दक्षिणी भारत के आक्रमणों का पता चलता है— तमिल ग्रंथ अहनानूर
  58. चंद्रगुप्त मौर्य का निधन कब हुआ— 297 . पू.

वैदिक कालीन धार्मिक अवस्था

आर्यों के धार्मिक विचार, विश्वास और आस्था की झलक हमें ऋग्वेद से प्राप्त होती है। धार्मिक मतभेद के कारण ही भारतीय आर्य ईरान छोड़कर भारत में बस गए थे। उनके धर्म को ‘देवधर्म’ कहा गया। भारतवर्ष में धीरे-धीरे उनके धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों का विकास हुआ। सरल ह्रदय आर्य प्रकृति के संपर्क में आया। उसकी रहस्यमयी शक्ति को देखकर वह आश्चर्यचकित और भयभीत हुआ। उसने उसकी आराधना और उपासना की। कालांतर में उसने प्रकृति के रहस्यमय स्वरूप का मानवीकरण कर डाला और उन्हें देवी-देवताओं का रूप दे डाला। वास्तव में ‘देवता’ का अर्थ ‘प्रकाश का ज्ञान देने वाला’ होता है। ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख मिलता है जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

१ आकाशवाणी देवता- द्यौ, वरुण, मित्र, सूर्य, सविता, उषा इत्यादि।

२ अंतरिक्षवासी देवता- इंद्र, रूद्र, वायु, मरुत इत्यादि।

३ पृथ्वीवासी देता- पृथ्वी, अग्नि,सोम, बृहस्पति, सरस्वती इत्यादि।

देवताओं को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए वैदिक आर्य उनकी स्तुति तथा यज्ञ करते थे। पशुबलि भी अर्पित करते थे। परंतु उन्होंने किसी देवता को प्रमुखता प्रदान नहीं की, सभी उनके लिए पूज्य थे, शक्तिशाली थे। इस प्रकार ‘बहुदेवतावाद’ का विकास हआ। परंतु आर्यों की जिज्ञासा यहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अनुभव किया कि इन समस्त देवताओं के ऊपर एक सर्वोच्च सत्ता, एक परम तत्व है। इसको वैदिक ऋषियों ने विभिन्न नामों – ‘हिरण्यगर्भा’, ‘प्रजापति’ तथा ‘विश्वकर्मा’ – से अभिव्यक्त किया और यह प्रतिपादित किया कि ‘सत्’ एक ही है। इस प्रकार उन्होंने ‘एकेश्वरवाद’ की परिकल्पना प्रस्तुत की।

ऋग्वेद में पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक का वर्णन मिलता है। वे आत्मा तथा पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। ऋग्वेद में अमरता का उल्लेख मिलता है। परंतु वैराग्य और मोक्ष में उनकी आस्था नहीं थी। उन्होंने नैतिकता पर विशेष जोर दिया।

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